ध्यान का अर्थ है -  
    चित्त की मौन, निर्विचार चैतन्य अवस्था  
  एक शरीर है, शरीर में मन है, प्रार्थना भी ध्यान है, पूजा उपासना भी ध्यान है,  
  मन के भीतर आत्मा है | शरीर से आत्मा योग भी ध्यान है, ज्ञान भी ध्यान है,  
  तक की यात्रा करने की विद्या का भक्ति भी ध्यान है,  
  नाम है - योग | इस यात्रा के आठ पड़ाव है- यदि इनसे चैतन्य अवस्था प्राप्त हो जाए |  
  यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,    
  धारणा, ध्यान, समाधि |    
    समाधि - अर्थात - कुंडलिनी जागरण |  
    इसके मार्ग में सात पड़ाव है - मूलाधार चक्र,  
  आइये - योग करें स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र,  
  आइये - ध्यान करें विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र एवं सहस्रार चक्र |  
  आइये - अपनी कुंडलिनी को जगाएँ |    
       
    यह आमंत्रण है उनको जो वास्तव में  
  हम आपको ले चलते है, उस शास्वत कुछ करना चाहते है | जो चाहते हैं,  
  सत्य की ओर | यह शास्वत सत्य कुछ मानव जीवन सार्थक हो, मानव  
  ओर नहीं बल्कि 'में ही हूँ |' में कभी जीवन आनंदित हो |  
  नहीं मिटता | और में हूँ |    
       
    सत - चित - आनंद | आनंदमय जीवन  
  बड़े भाग मानुष तन पावा | धारा बह रही है | आइये इसमें छलांग  
  सुर दुर्लभ सद ग्रंथन गावा | लगा दें और अनुभव करें |  
    आनंद - आनंद - आनंद |  
       
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